admin June 19, 2018

अकार्बनिक रसायन ( Inorganic Chemical )

अणु 

रसायन विज्ञान ( Chemical Chemistry)  में तत्व तथा यौगिक का वह छोटा से छोटा कण जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है, अणु कहलाता है।

पदार्थ अणुओं से मिलकर बने होते हैं और अणु परमाणुओं से।

साधारणतया इनका व्यास 4Å से 20Å तक होता है। (1Å = 10-10मीटर)।

किसी पदार्थ के अणु में उस पदार्थ के कोई भौतिक एवं रासायनिक गुण नहीं होते।

वास्तव में एक अणु न ठोस होता है, न द्रव और न गैस।

किसी भी पदार्थ का अणु उसी रूप में कभी रासायनिक क्रिया नहीं करता। इसके लिए अणु का परमाणु ओम में विभाजन आवश्यक है।

इलेक्ट्रॉन

इलेक्ट्रॉन की खोज जे. जे. थामसन ने की है।

इलेक्ट्रॉन एक वैद्युत ऋणात्मक आवेशित कण है। जो परमाणु मे नाभिक के चारो ओर चक्कर लगाता हैं। इसका द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु से भी हजारगुना कम होता है।

एक इलेक्ट्रॉन का नकारात्मक चार्ज -1 होता है

इस पर 1.6X10-19 कूलाम्ब परिमाण का ऋण आवेश होता है।

इसका द्रव्यमान 9.11X 10-31 किग्रा होता है

एक इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान प्रोटॉन के द्रव्यमान का लगभग 1836 वां भाग है।

परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉन की संख्या के समान है

एक इलेक्ट्रॉन e- द्वारा चिह्नित है इलेक्ट्रॉन तीन परमाणु कणों का सबसे छोटा कण है

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास                                          History of India

कक्षाओं (शेलों) एवं उपकक्षाओं (सबशेल) में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहा जाता है। उदाहरण –

सोडियम (Na)

सोडियम की परमाणु संख्या 11 (2, 8, 1)

सोडियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: 1s2, 2s2, 2p6, 3s1

मैग्नीसियम (Mg)

मैग्नीसियम की परमाणु संख्या 12 (2, 8, 2)

मैग्नीसियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: 1s2, 2s2, 2p6, 3s2

कैल्सियम (Ca)

कैल्सियम की परमाणु संख्या 20 (2, 8,8, 2)

-कैल्सियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s2

ईंधन
वह पदार्थ है जो हवा में जलकर बगैर अनावश्यक उत्पाद के ऊष्मा उत्पन्न करता है।

एक अच्छे ईंधन के निम्नमिखित गुण होने चाहिए :-

-वह सस्ता एवं आसानी से उपलब्ध होना चाहिए।

-उसका ऊष्मीय मान उच्च होना चाहिए।

-जलने के बाद उससे अधिक मात्रा में अवशिष्ट होना चाहिए।

-जलने के दौरान या बाद कोई हानिकारक पदार्थ नहीं होना चाहिए।

-उसका जमाव, परिवह्न आसान होना चाहिए।

-उसका जलना नियंत्रित होना चाहिए।

-उसका प्रज्वलन ताप निम्न होना चाहिए।

मुख्यतः ईंधन तीन प्रकार के होते है : –

ठोस ईंधन

ये ईंधन ठोस रूप में होते हैं तथा जलाने पर कार्बन हाइड्रोक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड व ऊष्मा उत्पन करते हैं। लकड़ी, कोयला, कोक आदि ठोस ईंधन के उदाहरण है।

कोयला:-

कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयला चार प्रकार का होता हैं :-

पीट कोयला :-

इसमें कार्बन की मात्रा 50% से 60% तक होती है। इसे जलाने पर अधिक राख एवं धुआँ निकलता है।

यह सबसे निम्न कोटि का कोयला है।

लिग्नाइट कोयला :-

इसमें कार्बन की मात्रा 65% से 70% तक होती है। इसका रंग भूरा होता है, इसमें जलवाष्प की मात्रा अधिक होती है।

बिटुमिनस कोयला :-

इसे मुलायम कोयला भी कहा जाता है।

इसका उपयोग घरेलू कार्यों में होता है।
इसमें कर्बन की मात्रा 70% से 85% तक होती है।

एन्थ्रासाइट कोयला :-

यह कोयले की सबसे उत्तम कोटि है। इसमें कार्बन की मात्रा 85% से भी अधिक रहती है।

द्रव ईंधन :-

द्रव ईंधन विभिन्न प्रकार के हाइड्रोकार्बन के मिश्रण से बने होते हैं तथा जलाने पर कार्बन डाईऑक्साइड व जल का निर्माण करते हैं। केरोसिन, पेट्रोल, डीज़ल, अल्कोहल आदि द्रव ईंधनों के उदाहरण है।

गैस ईंधन :-

जिस प्रकार ठोस व द्रव ईंधन जलाने पर ऊष्मा उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार कुछ ऐसी गैस भी हैं जो जलाने पर ऊष्मा उत्पन्न करती हैं। गैस ईंधन द्रव व ठोस ईंधनों की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक होते हैं व पाइपों द्वारा एक स्थान से दुसरे स्थान तक सरलतापूर्वक नियन्त्रित की जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त गैस ईंधनों की ऊष्मा सरलतापूर्वक नियन्त्रित की जा सकती है।

प्रमुख ईंधन गैसें निम्न हैं :-                                                 www.Facebook.com/gyanvekta

प्राकृतिक गैस :-

यह पेट्रोलियम कुआँ से निकलती है। इसमें 95% हाइड्रोकार्बन होता है, जिसमे 80% मिथेन रहता है। घरों में प्रयुक्त होने वाली द्रवित प्राकृतिक गैस को एल॰ पी॰ जी॰ कहते हैं। यह ब्यूटेन एवं प्रओमेन का मिश्रण होता है, जिसे उच्च दाव पर द्रवित कर सिलेण्डरों में भर लिया जाता हैं।

गोबर गैस :-

गीले गोबर (पशुओं के मल) के सड़ने पर ज्वलनशील मिथेन गैस बनती है, जो वायु की उपस्थिति में सुगमता से जलती है। गोबर गैस संयत्र में शेष रहे पदार्थ का उपयोग कार्बनिक खाद के रूप में किया जाता है।

प्रोड्यूसर गैस :-

यह गैस लाल तप्त कोक पर वायु प्रवाहित करके बनायी जाती है, इसमें मुख्यतः कार्बन मोनोक्साइड ईंधन का काम करता है। इसमें 70% नाइट्रोजन, 25% कार्बन मोनोक्साइड एवं 4% कार्बनडाइक्साइड रहता है। इसका ऊष्मीय मान 1100 kcal / kg होता है। काँच एवं इस्पात उद्योग में इसका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।

जल गैस :-

इसमें हाइड्रोजन 49%, कार्बन मोनोक्साइड 45% तथा कार्बनडाइक्साइड 4-5% होता है। इसका ऊष्मीय मान 2500 से 2800 kcal / kg होता है। इसका उपयोग हइड्रोजन एवं अल्कोहल के निर्माण में अपचायक के रूप में होता है।

कोल गैस :-

यह कोयले के भंजक आसवन से बनाया जाता है। यह रंगहीन तीक्ष्ण गंध वाली गैस है, यह वायु के साथ विस्फोटक मिश्रण बनाती है। इसमें 54% हाइड्रोजन, 35% मिथेन, 11% कार्बन मोनोक्साइड, 5% हाइड्रोकार्बन, 3% कार्बन डाइआक्साइड होता है।

-ईंधन का ऊष्मीय मान उसकी कोटि का निर्धारण करता है।

-अल्कोहल को जब पेट्रोल में मिला दिया जाता है, तो उसे अल्कोहल कहते हैं, जो ऊर्जा का एक वैकल्पिक स्रोत है।

-एल॰ पी॰ जी॰ अत्यधिक ज्वलनशील होती है, अतः इससे होने वाली दुर्घटना से बचने के लिए इसमें सल्फर के यौगिक (मिथाइल मरकॉप्टेन) को मिला देते हैं, ताकि इसके रिसाव को इसकी गंध से पहचान लिया जाय।

ईंधन का ऊष्मीय मान:-

किसी ईंधन का ऊष्मीय मान ऊष्मा की वह मात्रा है, जो उस ईंधन के एक ग्राम को वायु या ऑक्सीजन में पूर्णतः जलाने के पश्चात् प्राप्त होता है। किसी भी अच्छे ईंधन का ऊष्मीय मान अधिक होना चाहिए। सभी ईंधनों में हाइड्रोजन का ऊष्मीय मान सबसे आधिक होता है परन्तु सुरक्षित भंडारण की सुविधा नहीं होने के कारण उपयोग आमतौर पर नहीं किया जाता है। हाइड्रोजन का उपयोग रॉकेट ईंधन के रूप में तथा उच्च ताप उत्पन्न करने वाले ज्वालकों में किया जाता है। हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन भी कहा जाता है।

अपस्फोटन व आक्टेन संख्या :-

कुछ ईंधन ऐसे होते हैं जिनका वायु मिश्रण का इंजनों के सिलेण्डर में ज्वलन समय के पहले हो जाता है, जिससे ऊष्मा पूर्णतया कार्य में परिवर्तित न होकर धात्विक ध्वनि उत्पन्न करने में नष्ट हो जाती है।

यही ध्हत्विक ध्वनि अपस्फोटन कहलाती है। ऐसे ईंधन जिनका अपस्फोटन अधिक होता है अपयोग के लिए उचित नहीं माने जाते हैं जिससे इनका अपस्फोटन कम हो जाता है सबसे अच्छा अपस्फोटरोधी यौगिक टेट्रा एथिल लेड है। अपस्फोटन को आक्टेन संख्या के द्वारा व्यक्त किया जाता है।

किसी ईंधन, जिसकी आक्टेन संख्या जितनी अधिक होती है, का अपस्फोटन उतना ही कम होता है तथा वह उतना ही उत्तम ईंधन माना जाता है।

ऑफ़बाऊ नियम
इलेक्ट्रॉन भरते समय कम ऊर्जा वाले कक्षक पहले भरे जाएंगे जबकि अधिक उर्जा वाले कक्षक बाद में भरे जाएंगे, इस नियम द्वारा तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखने के लिए विभिन्न परमाणु कक्षकों की ऊर्जा बढ़ने का क्रम इस प्रकार है-

1s < 2s < 2p < 3s < 3p < 4s < 3d < 4p < 5s < 4d < 5p < 6s तथा आगे इसी प्रकार अर्थात 1s का उर्जा स्तर निम्नतम है तथा 2s उपकक्षा का उर्जा स्तर 1s से अधिक है।
और, 2p का उर्जा स्तर 3s के उर्जा स्तर से कम है।
और, 4s का उर्जा स्तर 3d के उर्जा स्तर से कम है।

अश्रु गैस
‘क्लोरोपिक्रिन’ एक जहरीला रसायन है, जिसका रासायनिक सूत्र CCl3NO2 है। यह अश्रु स्रावक है और त्वचा तथा श्वसन तंत्र के लिए भी हानिकारक है। 3 से 30 सेकण्ड तक 0.3 से 0.37 पीपीएम क्लोरोपिक्रिन के सम्पर्क में आने से अश्रु-स्राव तथा आँखों में दर्द होने लगता है। प्रबल अश्रु स्रावक होने के कारण क्लोरोपिक्रिन का प्रयोग अश्रु गैस के रूप में होता है।

एक हथियार के रूप में प्रयोग की जाने वाली गैस है।

अनियंत्रित तथा उपद्रव कर रही भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अश्रु गैस का उपयोग किया जाता है।

हालांकि अश्रु गैस छोड़ने के बाद आँख में थोड़ी जलन होती है, लेकिन पानी से धोने के बाद यह जलन तुरंत समाप्त हो जाती है।

जब अश्रु गैस आँखों के सम्पर्क में आती है तो कॉर्निया के स्नायु उत्तेजित हो जाते हैं, जिससे आँख से आंसू निकलने लगता है, दर्द होता है और अंधापन भी हो सकता है।

प्रमुख अश्रुकर गैसें हैं- OC, CS, CR, CN (फेन्यासील क्लोराइड), ब्रोमोएसीटोन, जाइलिल ब्रोमाइड तथा
सिन्-प्रोपेनेथिअल-एस-आक्साइड

नाभिक

नाभिक की खोज = रदरफोर्ड

नाभिक परमाणु के मध्य स्थित धनात्मक वैद्युत आवेश युक्त अत्यन्त ठोस क्षेत्र होता है। नाभिक, नाभिकीय कणों प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन से बने होते है। इस कण को नूक्लियान्स कहते है।

प्रोटॉन व न्यूट्रॉन दोनो का द्रव्यमान लगभग बराबर होता है और दोनों का आंतरिक कोणीय संवेग (स्पिन) 1/2 होता है।

प्रोटॉन इकाई विद्युत आवेशयुक्त होता है जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता है।

प्रोटॉन और न्यूट्रॉन दोनो न्यूक्लिऑन कहलाते है।

नाभिक का व्यास (10−15 मीटर)(हाइड्रोजन-नाभिक) से (10−14 मीटर)(युरेनियम) के दायरे में होता है।

परमाणु का लगभग सारा द्रव्यमान नाभिक के कारण ही होता है, इलेक्ट्रान का योगदान लगभग नगण्य होता है।

सामान्यतः नाभिक की पहचान परमाणु संख्या Z (प्रोटॉन की संख्या), न्यूट्रॉन संख्या N और द्रव्यमान संख्या A (प्रोटॉन की संख्या + न्यूट्रॉन संख्या) से होती है जहाँ A = Z + N

नाभिक के व्यास की परास “फर्मी” के कोटि की होती है।

इनके अलावा नाभिक के कई गुण होते हैं जैसे आकार, आकृति, बंधन ऊर्जा, कोणीय संवेग और अर्द्ध-आयु इत्यादि।

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